शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

धनधन अंग्रेज बहादुर् बहादुर्

लिय' ओत्त' लंडनमे फेर सगूफा छूटल अछि...कहाँ दन कोनो संस्था पढल_लिखल
हज़ारों अंग्रेजबा सब स' पूछल कै त' मात्र तीने प्रतिशत गछल कै जे ओक्ररा ईश्वर के असतित्व मे विश्वास छै, नहि त' 97 प्रतिशत मूडी डोला देलकै। एहन सन क्रम जेना होइत होइ कि नहिं; छै कि नहि छै; एकरा सोचि क' माथा खराब करबाक ककरा पलखति छै ? माने ईश्वरक भेनाइ नहि भेनाइ के अंग्रेज़ सब लए कोनो मानि नहि छै । अंग्रेज़ धन्य; ओकर पछिलग्गू, ओकरो स' धन्य। बच्चा रही त' एक टा बहादुर (नेपाली ) रहै। रमकै त' बडा मीठ सुर मे गावय__'धनधन अंग्रेज़ बहादुर, पानी जहाज चलाये को हावा मे जहाज उडाये को...धनधन अंग्रेज़ बहादुर.....

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

मंगनीक चन्दन,,घंस रघुनन्दन् रघुनन्दन्

कोनो नवहटिया के कहबै ने, त' कहै स' पहिने हँस' लागत। नवहट्टा मे सदाय स' गप्पी नहि...एहन गप्प होइत रहलैये जे गप्पी सबहक गप्पक विषय हो...कने सोचियौ ने जे ताडक गाछक क्यो बियाह करेने हैत कत्तौ ?किन्नहु ने ।महराज दरभंगो कुकुरे बिलाइ तक सीमित रहला।मुदा नवहट्टा मे भेलैये । ककरो पाइ हेतै त' ऐ बैबे कि ओइ बैबे ओ गाम मे बँटने फिरतै ? मुदा आइक तारीख मे पचीस_पचास टा नभटिया एहन हैत जे कत' ने कत' स'___कैक करोड कि कैक अरब टाका कमा क आयल ओ नभटिया, कम्मे वयसक एकदमे निम्न मध्यम वर्गक ओ नवयुवक स' पाबि रहल अछि । चाहे जेना कमायल हो, टाका के ओ औकात बता रहल छै ।कहै टा नहि छै ओ नवहटिया युवक एन।आर.आइ.....जकरा पर ढरल, दू _चारि....हज़ार नहि महराज, दू_चारि लाख द' दै छै । छै कोनो गाममे कोनो एहन् धनपति ? एखन दस_बीस_टा नवहटिया ऊठि बैसल अछि। सबहक मोनमे जेना.... ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगाक.. भाव।
भने सब बरदायल अछि। खाली मरं_मोकदमा ,झांई_झंझट नहि करे। नवहट्टामे ओलबा _दोलबा नहि उठाबय, आ अंत मे मन्दिर बनाबय; जल्दी।

"रेलीजियस ब्लैक्मेल"

बुझले हैत, सब नवहटिया जकाँ हमहूं ओत्तै रही जकरा लोक नवहट्टा कहै छैक! बीस बाइस दिनुका नम्हर स्टे मे कहियो पुरनका उत्सवक रौनक लगैत...पूजाक ओ पुरना खुनकी कत्तौ हवा_वसात मे बुझाइत...कत्तहु किछु नहि । ओकर लसि नहि भेटत जे हमरा सबके कहियो बिना मोलेक भेटैत रहैत छल...पूजा मे पैघक आशीर्वाद,सिनेह आ दुलार, मोनक उछाह_उद्गार, बाल_बोधक प्यार_दुलार !आब, अहि गाममे भक्ति बिकाइ छैक ! पूजा जेना पहिने कोनो ज़मिन्दार की राजाक ज़मानामे एक गोटेक मोने होइ छलै तहिना अइ बेर एकटा एन.आर।आइ अपन जेबी स' पूजा केलक।अहि मे चाहे एकशताब्दी स' चलल आबि रहळ पद्धतिक हनन होइत हो कि कैक दशक स' चलल आबि रहल ओकर सार्वजनिक रूप समाप्त भ' गेल हुए। सर्व प्रथम त' हर नवहटिया ई पुछ' चाहैछनि जे राज बनैली कि राज श्रीनगरक अक्षुण्ण कृति पर कोन अधिकार स' ओ अपन पिताक नाम लिखवा रहला अछि ? विगत दू वर्ष मे अन्दाजन करोडॉ रुपैयाओ खर्च केलनि अछि ? एत्ते ओ कोन पैसा खर्च क' रहला अछि एक नम्बरक ? कि एक नम्बरक पाइ अहिना खर्च कैल जाइ छै? कि नवहट्टा मे मन्दिर बनै स' पहिने नवहटिया सबके अराजकता आ हिंसा सह' पडतैक ? कि मन्दिर बनेबाक यैह रास्ता ओ लक्ष्मी पुत्रके सुझेलनि जे ओहो लोकने चिन्हाइ छनि जे जगत विदित अछि ? सत्ते, अधिक पाइ भेने सोच_विचार_उचित_अनुचित सब किछु बिसरि जाइ छैक। मुदा जँ ओ मन्दिर बनि जाई त' सत्ते अक्षरधामक नकल हेतै ! चौंकियौ नंइ बाबू, नवहट्टा छियै...जे हेतै से_ राज श्रीनगरक छै राज श्रीनगरक छलै जे अवस देखिये देखन जोगू.....से चाहे मारिये कियै ने हुए....ओना लक्ष्मीपुत्रक सौ गुनाह माफ....पहिने मन्दिर त' बनए। हं अहि बीच नवहटिया चालिमे फंसि कं दू_चारि चमचा सबहक दुश्मनीक बदला सधबै मे जँ लक्ष्मीपुत्रक अहिना 'इस्तेमाल' भ' जानि त' कोन आश्चर्य ? ओना मन्दिर बनबै स' पहिने बापक साइनबोर्ड टाँगब कोनो नीक बात भेलै ? हम पुछै छी ? आ छोट_छोट छौंडाके फरमाबरदार बनबअले लाखों रुपैया कि मोटर साइकिल द' देब...ओकरा गुंडैक ट्रेनिंग देब...कोनो नीक बात भेलै...मन्दिर बनायब कीर्ति करब थिकै...कीर्ति यज्ञ स' होइ छैक जाहि स' लोकक मोन स' यज्ञ कर्ता लए आशीर्वाद हार्दिक आशीर्वाद निकलै छै तखन ओ सफल मानल जाइ छैक। जाहि यज्ञ मे झगडा आ मोकदमा भेल ओ त' शूरू होइ स' पहिने असफल यज्ञ अछि । तैं __अष्टादशपुराणेषू व्यासश्य वचनद्वयम/ परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीरणम्॥

शनिवार, 19 सितंबर 2009

असली प्रशंसा

जेना कोनो बरियाती गेला स' शारीरिक असुविधा छोडि एक्केटा वस्तु भेटैत छैक आ ओ थीक लोक, अपन लोक एक ठाम, तहिना साहित्यिक गोष्ठीमे गेला संता सैह फैदा होइ छै।काल्हि स्व।हरिमोहनझाजीक जयंती आयोजन मे जा सैह लागल।आब कहां क्यो किछु एहन कहैत अछि जे मूडी घुमा क' देखियै आ कान पाथि क' सुनियै।सब ठाँ अहाँके वैह भेटत जेकरा अहां चर्वित चर्वण कहि क' अंठा दियै' ।काल्हि अहिना एक टा उदयीमान लेखक आ वर्तमान 'परफेसर' एना बोर केलनि...अहि स' नीक त' हरिमोहनबाबू पर विद्यार्थी स लिखैत अछि।की विलक्षण जे हमरो कैक परीक्षामे हरिमोहनबाबूक रचना पर लिख' पडल अछि। की आश्चर्य जे ओ हमरो पढेने छला आ हमर पितृव्य(श्री दिव्यानन्द सिंह) के सेहो।अपन बात कहैत हम सत्ते कहलियै जे एखनो जँ मोन उबियाइत अछि, की करी की नहि करी...की पढी...की नहि पढी...? त' हम हरिमोहनबाबूक कोनो किताब पढ' लगै छी। कोनो लेखकक, हमरा जनैत सब स' पैघ प्रशंसा यैह छियै...ई जँ क्यो हमरा कहैत त' हम फूलि क' कुप्पा भेल रहितौं। आमीन।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

लेखक आ लेखनक अनजानल पक्षपक्ष

एक टा निमंत्रण पत्र पर मुंशी प्रेमचन्द तुकाबन्दी(तुकबन्दी) केने रहथि_'सब के लिये निमंत्रण अपना जन मानें/ और पधारें इसको अपना ही घर मानें।' अहिना स्व। किरण जीक पांती भेटल__"किंतु मैथिली का तो मैं ही एक मात्र आधार/ मेरे बल पर ही अब तक है इसमे जीवन का संचार" । यात्री बाबा, माँ मिथिला के अंतिम प्रणाम कैक बेर केने हेता, कैक बेर ओइ धूल_धूसरित,षडयंत्र स' परिपूरित, कैक युगक जडताक मारल मिथिला घूरि क' नहि जाइ, हमरे जेकाँ सोचने हेताहे__मुदा लिखै छथि__"यश_अपयश हो,लाभ_हानि हो,सुख हो अथवा शोक/सभ स' पहिने मोन पडैछ अपने भूमिक लोक।" अपन भूमि...अपन लोक...ककरा ई लोकनि कहथिन ? हमरा त' होइत अछि जे लेखक कवि लोकनिक बारे मे ओहेन बात जनाबी जे ककरो बूझल नहि छैक। मुदा से आब फेर कहियो।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

लिखबाक बेगरता

लिखैक वाध्यता मे कखनंहु नीको चीज़ लिखा जाइ छै ! हमरा अपन आ आनोक कैक टा रचना सब मोन पडि आयल जे अत्यधिक दबाब आ तनावमे लिखायलछलै। पैघ लेखक यथा रेणुजी(फणीश्वरनाथ रेणु) कि राजकमल,यात्री आदि आर्थिक दबाब मे लिखै छला; संपादक किंबा प्रकाशक के तगादा अबै छलनि ,लिखै जाइ छला।
शरद होथि कि अज्ञेय, पैसा बहुत पैघ मोटिभेटिंग फैक्टर छलै। सुकुर छैक जे आइ तक पैसा ई त' डिसाइड केलक जे के लिखत, कहिया लिखत ? मुदा की लिखत ? ई एखनंहु लेखके निर्णय करैत अछि।अइ देशक लोकके भूखल राखि दियौ, असुरक्षित रह' दियौ सब सहि लेत___मुदा मुंह जँ' जाबि देबै, बजैलए जँ' नंहि देलियै, त' विद्रोह क'
देत। लिखैक वाध्यता तखनो होइ छैक जखन बजै पर पाबन्दी हुए।इन्दिराक इमरजेंसी में एकर नीक अनुभव भेल लोक के !

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

हम अपना के आलसी नँइ बूझै छी, क्यो आइ तक ई 'रीमार्को 'ने देलक।जखन कि बच्चे स' हमर सब क्रिया_कलाप के लोक देखैत आयल , नीक बेजाय,जे भेलै से कहैत आयल।मुदा पता नँइ आइ काल्हि गाम जायब दुर्ग बूझि पडैत अछि, जखन कि संचार क्रांतिक कारणे कहबे केलंहु जे आवागमन बहुत सुलभ भ' गेल छैक। मुदा शनैः_शनैः रेडिओ मे काज केला स' जे चुस्ती_फुर्ती हमर स्वभाव बनि गेल छल अछि, से वयस आ कोनो डेडलाइन पकडै के बेगरता बिनु बिझायल जा रहल अछि। त' की हमरा कोनो व्यस्तता तकबाक चाही ? हमर चाची जी एक टा फकडा कि लोकोक्ति जे कहियै, कहैत रहथिन जे__"मरैक सोचि क' खेती नँइ करी आ जीवी त' खाई की?" लिखैयो लेल हमरा अहिना अपना के जोर लगब' पडैत अछि। भ' सकैत अछि ई वयसक कारणे हुए; पहिनो त' किछु काज रहै जे करैमे हमरा आसकति लगैत रहै ! नँइ, हमरा अपन समय के सब स' सही उपयोगक उपाय सोच' पडत।