बहुत दिन भ' गेल रहै। पाकिस्तानी आतंकवादी लए ई असह्य रहै। ई लोकनि चारि टा बडका देश भक्तक नांगडिलोकनि जे टाइम्स ग्रुप मे काज करै छथि आ अपनाके स स' पैघ काबिल बुझै छथि से " अमन की आशा " चिचियेनाइ शुरुए केने रहथि। प्रायः टाइम्स ग्रुप के नाड_पुडैन
अमेरिके मे गाडल रहै छै, भ' सकैत अछि तौं चिकडल हुए। मुदा मास दिन स' नीक अखबारबाज़ी भेल, फेर बच्चनजीक "मधुशाला" के हुनकर महानपुत्र सस्वर गाबि ई कहखिन जे मन्दिर_मस्जिद त' दुश्मनी
करबै छै, मेल त' मधुशाले मे होइ छै, ओइ दिस स' महानकलाकार इंतजार हुसैन छला जे फैज़ के नज़्म "ये दाग़__दाग़ उजाला" सुना क' ई बता रहल छला जे शांति के आशा नहि छोडबाक चाही....की काल्हि
सांझ पूनाक जर्मन बेकरी मे पाकिस्तानक लश्कर धमाका क' क' जना देलक जे ओकर मंशा की छै ? जाबे तक सांपक मुंह के नीक जेकाँ थूरल नहि जेतै अमन के आशा जखने करब ओ ब्लास्ट क'क' बता देत जे ओकरा की चाही ?
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
की आश्चर्यो ?
.....ई लगा चारिम पांचम पोस्टिंग हैत जे ब्लौग लिखिते लिखैत, कंप्यूटर नामक वन मे कत्तौ हेडा गेल। कोनो बेर बीच मे टावर ला पता। बडा जान खिसियायल। नीक_नीक पोस्टिंग सब रहै। इहो ऊहि नंहि जे ड्राफ्ट सेव क' लितंहु। आब जे भेलै से भेलै...आर की? समय धीरे_धीरे अपन रंग जमब' लगलै। अहां बूढ आ जवान भ सकै छी...प्रकृति अक्षय यौवना होइ छै....सदा सर्वदा अपन नियत समय पर हर साल अपन चोला आ कलेवर बदलैत। अ इ बेर जाड कने बेसी पडलै, गाछ_वृक्ष सब ओहि पाला स' उबरिये रहल छै। किछु हुए, आब ओ दिन दूर नहि छै जखन कालिदासक संपूर्ण यौवनाक रक्ताभ पैरक एक हल्लुक ठोकर स' 'च्यूत_वृक्ष' मे लाल कोंपल फुटतै....ओकर संग पूरा प्रकृति देतै...सब बेर ठीक समय पर। की आश्चर्यो ?
बुधवार, 27 जनवरी 2010
रोजनामचा
जाड फक स' छोडि देलकै त' लागल जे अहू बेर कत्ते गोटा के ई जुऐल कनकनी ल' गेलै...माने जे एखनो कत्ते लोक भोजन_वस्त्र_आवास स' वंचित जे अकाल मृत्यु के प्राप्त करैत अछि। हमरा कखनो क' डर भ' अबैत अछि,लगैत अछि जे एक दिस अरब पतिक संख्या मे वृध्धि आ दोसर दिस बी.पी.एल. क टाल...ई कोन प्रगति आ डी.जी.पी.ग्रोथ भेल?
हाल मे एकटा टी.भी.प्रोग्राम मे डा. हेतुकर झा कहलखिन जे मैथिल की भारतीय समाजक कोनो भविष्य नहि छैक कारण जे मल्टीनैश्नलक मोताबिक लोक के जीवन यापन कर' पडतै, तैं आब अहि समाज के संस्कृति नंहि रहत। एवरीथिंग इज़ फिनिश्ड। हमरा किछु वर्ष पूर्व भारत आयल फ्रांसिसी दार्शनिक देरीदा मोन पडि अयला। जे अबिते उद्घोष केलनि जे आब साहित्य मरि गेल, उपन्यास लए कोनो विषय शेष नहि रहल, आब कवि की कहता, सब किछु कहल चल गेल अछि। एकर किछुए दिनुका बाद पं.गोविन्द झा जी के हरलनि ने फुरलनि कहल्खिन जे आब मैथिली भाषा नहि बचत। एकर किछुए दिनुका बाद बी।जे.पी. सरकार एकरा मान्यता द' बैसलै।
हाल मे एकटा टी.भी.प्रोग्राम मे डा. हेतुकर झा कहलखिन जे मैथिल की भारतीय समाजक कोनो भविष्य नहि छैक कारण जे मल्टीनैश्नलक मोताबिक लोक के जीवन यापन कर' पडतै, तैं आब अहि समाज के संस्कृति नंहि रहत। एवरीथिंग इज़ फिनिश्ड। हमरा किछु वर्ष पूर्व भारत आयल फ्रांसिसी दार्शनिक देरीदा मोन पडि अयला। जे अबिते उद्घोष केलनि जे आब साहित्य मरि गेल, उपन्यास लए कोनो विषय शेष नहि रहल, आब कवि की कहता, सब किछु कहल चल गेल अछि। एकर किछुए दिनुका बाद पं.गोविन्द झा जी के हरलनि ने फुरलनि कहल्खिन जे आब मैथिली भाषा नहि बचत। एकर किछुए दिनुका बाद बी।जे.पी. सरकार एकरा मान्यता द' बैसलै।
शनिवार, 23 जनवरी 2010
पुनः प्रयास
कोनो विद्वानक कथन मोन पडैत अछि, मनुक्ख अपना सुख लए जत्ते वस्तुक निर्माण केलक ओइ स' अधिकतर ओकरा दुःखे भेलैये, सुख कमे। हमर इंटरनेटो अहिना अछि। जहिया स' राजस्थान स' घुरलंहु
ई चारिम बेर ब्लौग लिखि रहल छी। सब बेर लाइन दगा दैत अछि, ब्लौग आधे पर रहि जाइत अछि। पता नहि, अहू बेर पोस्ट हैत कि नंहि। तैं सब के हेलो ! कहैलए ई पोस्टिंग़
ई चारिम बेर ब्लौग लिखि रहल छी। सब बेर लाइन दगा दैत अछि, ब्लौग आधे पर रहि जाइत अछि। पता नहि, अहू बेर पोस्ट हैत कि नंहि। तैं सब के हेलो ! कहैलए ई पोस्टिंग़
रविवार, 22 नवंबर 2009
हमर विपरीत पद्धति 2
( पछिला पोस्टिंग़ क़ॆ बाद) ...हमर जायज शंका छलए जे एत्ते श्रम स' ई अनुवाद क' रहला अछि, त' पूछि लेबाक चाही जे एकरा छपतनि के, फेर एकरा पढतनि के? हुनका से सब नहि बुझल छनि। रिटायर क' क'बैसल छलंहु
कोनो काज नहि छल , भजार कहलनि जे बैसल छी, कियैक ने भागवतक मैथिली अनुवाद करै छी, मैथिली मे छैको नंइ। बस क' रहल छी। आब एकरा के छापत, के पढत(?) से जानथि महरानी(काली)! आब भजारक कहला पर पंडित जी रोज महीनो स' मेहनति क' रहल छथि से आर के क' सकैत अछि बिनु अखजी लोक के ? यैह तटस्थता, यैह निर्लिप्तता, यैह फलक आस बिनु केने कर्म रत रहबाक परंपरा हमरा सब (मैथिल) के आन लोक सब स' अलग करैत अछि, विशिष्ट , निविष्ट आ अनुकरणीय बनबैत रहल अछि। ई दुर्भाग्य जे हुनका मुइलाक बाद जे सासुर गेलंहु त' एक दुपहरिया पछवाक तोड पर वैह मोती सनक आखर मे कैल अनुवाद भरि आँगन उडियाइत देखलियै। तेन किम् ! बुढा त' अपन काज क' क' चल गेला, आब लोक ओकरा संगे जे करय !
कोनो काज नहि छल , भजार कहलनि जे बैसल छी, कियैक ने भागवतक मैथिली अनुवाद करै छी, मैथिली मे छैको नंइ। बस क' रहल छी। आब एकरा के छापत, के पढत(?) से जानथि महरानी(काली)! आब भजारक कहला पर पंडित जी रोज महीनो स' मेहनति क' रहल छथि से आर के क' सकैत अछि बिनु अखजी लोक के ? यैह तटस्थता, यैह निर्लिप्तता, यैह फलक आस बिनु केने कर्म रत रहबाक परंपरा हमरा सब (मैथिल) के आन लोक सब स' अलग करैत अछि, विशिष्ट , निविष्ट आ अनुकरणीय बनबैत रहल अछि। ई दुर्भाग्य जे हुनका मुइलाक बाद जे सासुर गेलंहु त' एक दुपहरिया पछवाक तोड पर वैह मोती सनक आखर मे कैल अनुवाद भरि आँगन उडियाइत देखलियै। तेन किम् ! बुढा त' अपन काज क' क' चल गेला, आब लोक ओकरा संगे जे करय !
शनिवार, 21 नवंबर 2009
हमर विपरीत पद्धति
ओना अखज लोक सब ठाँ, कहैक माने जे सब समाज मे भेट जायत, मुदा मैथिल एक त' एहन कोनो मोंछक लडाइ मे पडबे ने करत, आ जँ बाबू पडि ग़ॆल त' हठ्ठे छोडबो ने करत। अपन सासुरक गप्प कहै छी, ओइ ठाम कहाँअ दू गोटा मे गौंआ लागल रहनि। घरो एके टोल मे रहनि।एक गौंआ त' पढि -लिखि क' शास्त्रीय आचार्य तक पढि गेल रहथिन आ बहुते स्मार्ट सूरत गुजरात मे पढौनी क' क' चिक्कन पाइ कमाइत रहथि। दोसर गौंआ के दू_चारि बिगहा धनहर खेत बंटाइ पर लागल रहनि।पहिलुका जमाना रहै।खेत उपजै।बंटाइदार बैमानी नंहि करै। लोक उदार छलैक ओहि ठाँमक। खत्ता_खुत्ती, डबरा_डुबरी, पोखरिं_झाँखडिक कमी रहबे ने करै। बागमती मेबाढि अबै । बाढि मे मांछ अबै।दोसर गौंआ एकटा कडची मे बंसी बना भरि दिन मांछमारे। सांझ तक तीमन जोगरक भ' जाइ।घर जाय आ 'मांछ भात_सात हाथ" कहैत अफडि क' भोजन करय आ आ पसरि क' पडि रहय। एक बेर एकर गौंआ सूरत स' घुरलै त' बडा सिनेह स' गौंआ लए घडी किनने एलै।तहिया घडियो अलभ्य रहै। मुदा समस्या छलै जे दोसर गौंआ घ्डी देखतै कोना, ओ त' लिख लोढा_पढ पथ्थर छलए। गुजराती गौंआ एकरा बडे धुसलकै, रेवाडलकै, गंजनक त'र देलक।घडियो ने देलकै। एकरा बड्ड दुख भ्लै। पैंतीस बर्खक छलए जे कलम छूने छल। हमर बियाहक साल ओ मैट्रिक के परीक्षा दै बला छल।....एक गोटे के पुछलियनि_" ई की लिकहै छियै ?"त' कहलनि जे ई भागवतक मैथिली अनुवाद छिय्
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